Wednesday, November 25, 2009

मै कैसे सफल हुआ




दोषतो मै आज आप से यह बताउगा की हकलाना को ठीक करने के लिए मेरे अन्दर हिम्मत कैसे आयी | मै ग्यारवी का पेपर दे रहा था तभी मेरे घर में राजदूत गाड़ी खरीदी गई | मै बहुत उत्सुक था गाड़ी चलाना सिखने के लिए ,मै पहले बंद गाड़ी को ही धकेलता था चुकी अंकल और पापा जी का डर हुआ करता था , बच्चो को गाड़ी चलाना अलाऊ नही था ,उनके घर पर न रहने पर घर के अन्दर ही गाड़ी को धकेलता था ,कभी गाड़ी में बैठ कर तो कभी गाड़ी के साथ पैदल चल कर | ऐसा १-२ माह चलता रहा ,एक दिन घर में कोई नही था तभी मै हिम्मत जुटाया और गाड़ी घर के बहार निकला और स्टार्ट करके गयर लगाया और क्लच जैसे ही छोड़ा गाड़ी बंद हो गई | बार बार यही होता और मै अन्दर से डर भी रहा था की ( अंकल आगये तो , गाड़ी भीड़ गयी तो ,गाड़ी गिर गयी तो ) लेकिन गाड़ी चलाना सीखना ही था | मै बार बार बार बार प्रयाश करता रहा सिखने के दौरान मेरे छोटे भाई को चोटभी आयी ,गाड़ी भी गिरी ,डाट भी पड़ी | फ़िर भी गाड़ी सिखा जब गाड़ी सिख रहा था तब बहुत डर था अंकल का ,गाड़ी गिरने का ,चोट लगने का ,गयर- क्लच -अक्सिलेटर -ब्रक, लगाने का | गाड़ी सिखने के बाद किसी का बिल्कुल भी डर नही रहा
शिक्षा
दोषतो एक तरफ मै गाड़ी सिख रहा था सफल हो रहा था दूसरी तरफ़ हकलाहट डिमक की तरह अन्दर ही अन्दर मुझे बर्बाद कर रही थी ,कुछ समझ में नही आरहा था की मै कैसे आंगे बढू ,क्या करू , जिस काम की सुरुआत करू उसी में हकलाहट की वजह से फ़ैल हो जाऊ

गाड़ी सिखने के बाद मै अन्दर से सोचा यार गाड़ी चलाना मै सिख सकता हु तो बोलना भी तो शीख सकता हु
और कहते है की यदि किसी काम को अन्दर से , मन से , संकल्प के साथ प्रतिज्ञा करके शुरू किया जाय तो वह उस काम का सफल रिसल्ट उसी समय तय हो जाता है, बाकि रहती है सिर्फ़ प्रोसेस | प्रोसेस कम्पलीट होने पर वही रिसल्ट मिलता है, जो आप ने शुरू में प्रतिज्ञा किया था | ये बात अवश्य है की प्रोसेस में कुछ कठिनाई ,कुछ उतर चड़ाव अवश्य आते है| यदि आप का लगन ,प्रतिज्ञा निश्चित है तो इन समश्यो को आसानी से जीता जा सकता है |
मैंने अपनी हकलाहट को कैसे कंट्रोल करना प्रारम्भ किया
मै कई स्पीच थेरापिस्ट , ई एन टी डॉक्टर से सुन चुका था और डिप्लोमा और सैकोलोजी ग्रेजू एसन से मुझे थेओरी पता हो चुकी थी की हकलाहट को कंट्रोल करने के कुछ स्टेप है
१-स्पीड धीमा करना :- स्पीड धीमा से मेरा मतलब यह नही है की विल्कुल धीमा बोलो , लेकिन सोफ्ट ,स्मूथ ,सपष्ट , बिना प्रेसर के बोलना चाहिए , लेकिन यह आसन काम नही था क्योकि हमारी आदत पीछेले २५ वर्ष से पक्की हो चुकी थी | मै जितना स्पीड कंट्रोल करता उतना ही मेरी स्पीड बढ रही थी ,मै कई बार ऐसा मह्सुश कर रहा था की यह न मुमकिन है ,बार बार प्रयाश करता हार जाता फिर

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