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Friday, September 18, 2015
Friday, August 23, 2013
FREE ANTI STAMMERING PSYCHOTHERAPT(FASP)
प्रिय मित्रो सबसे पहले मै आप को बधाई देना चाहता हूँ की आप ने FASP ज्वाइन किया इस मेथड के नीयम शर्त निम्न लिखित है
1-आप को 200 स्टीकर भेज रहे है , इन स्टीकर को 100 बसों में चिपकाना है अर्थात एक बस में 2 स्टीकर चिपकाना है
2 -स्टीकर को बस के बहार नहीं चिपकाना है ,बस के अन्दर ऐसी जगह चिपकाना है जहा अधिक से अधिक लोग देख सके ( जैसे ड्राईवर के पीछे जहा टीवी लगी होती है )
3 -स्टीकर को सीधा चिपकाना है जिससे देखने में अच्छा दिखे यदि आप तिरछा ,टेढ़ा गलत चिपकाते है तो बस मालिक स्टीकर निकाल देगा और आप की मेहनत बेकार होगी
3 स्टीकर चिपकाते समय बस वाले बहुत सपोर्ट करते है क्युकी माँ लक्ष्मी की फोटो लगी है और माँ लक्ष्मी को कोई माना नहीं करेगा ,यदि कोई बिरोध करता है तो लड़ना नहीं है क्षमा मांग लेना है ,मुस्कुराकर बोलना है गलती हो गई , मै अभी स्टीकर निकाल देता हूँ और निकाल दीजिये
4 -जब बस आकर बस स्टैंड में खड़ी होती है तो बस ड्राईवर और कंडेक्टर यहाँ वहा चले जाते तब भी आप आराम से स्टीकर लगा सकते है और बिरोध से बच सकते है
5 - यदि बस खड़ी हो उसमे कंडेक्टर ड्राईवर बैठे हो तो इस प्रकार पूछिये "सर यह माँ लक्ष्मी की फोटो चिपका दूँ " यदि आज्ञा दे तो ही चिपकाना है वरना मत चिपको
6 - जब आप सारा दिन चिपकाओगे तो कुछ लोग बोलेगे की स्टीकर मुझे दे दो मै प्रचार लिए अपनी बस ,घर , दुकान में चिपका दुगा , स्टीकर नहीं देना है क्युकी वह किसी की पीठ में मजाक के लिए चिपका देगा , यदि बहुत ही रिक्वेस्ट करता तो केवल एक स्टीकर दीजिये
7 -सुबह 8 से शाम 5 तक अपने जिला के तो स्टैंड में है और 100 बस में स्टीकर चिपकाना है
8 - स्टीकर चिपकाने के बाद आप कॉल करके बता दीजिये की आज स्टीकर चिपका रहा हूँ तो मेरे कर्मचारी यदि आस पास के जिलो मे होगे तो आ कर चेक कर लेगे ,यदि नहीं होगे तो 20 -30 दिन के अन्दर कर्मचारी भेजेगे सुबह 8 से 5 बजे शाम के बीच बस स्टैंड में खाड़ी 20 बस में देखेगे कम से कम 16 बस में स्टीकर लगे होना जरुरी है
8 - बहुत से लोग स्टीकर कम चिपकाते है ,नहीं चिपकाते है , झूंठ बोलते है की स्टीकर चिपका दिया हूँ यदि आप ऐसा करेगे तो आप को FASP का मटेरियल नहीं भेजी जाएगी , आप के काम का रिजल्ट आने के बाद ही FASP का मटेरियल भेजेगे ,आप एक दिन इमानदारी से काम कीजिये , आपकी स्पीच ठीक करने की जवाबदारी मेरी
Wednesday, July 24, 2013
पागल कुत्ता और हकलाना
पागल कुत्ता और हकलाना
दोश्तो आप हमेशा सोचते है की मेरी स्पीड क्यों कंट्रोल नहीं होती है , मै आप को आज यह बताउगा की हमारी स्पीड क्यों बढ जाती है ? और हम घबडा जाते है \मित्रो बात यह है की हम हकलाहट को एक पागल कुत्ता मानते ,और जब पागल कुत्ता हमारे सामने आता है तो हम कैसा व्यव्हार करते है ? हमारी चलने की स्पीड कैसे बदती है ? हमरी धड़कने कैसे बढ जाती है? आप स्यम उत्तर सोचिये
मेरा मतलब साफ है की जैसे ही कोई हार्ड वर्ड आता है , वैसे ही हम हार्ड वार्ड को पागल कुत्ता मन कर ,अपना दुसमन मन लेते है , और घबडा जाते है \
अब आप को थोडा और आगे ले चलते है और विचार करते है की कुत्ता को यानि हकलाना को दोश्त कैसा बनाये
मन लीजिये की रातको आप कही बहार से घर आये रास्ते में एक कुत्ता मिला और आप के पीछे पड गया आप के पास दो रास्ते है
1- दौड़ लगा दो ---- यदि आप दौड़ लगा देगे तो कुत्ता आप के पीछे दौड़ेगा और थोड़ी ही देर में आप को कट लेना आप बुरी तरह फस सकते है , आप हकलाना के श्रेत्र में यही करते है , जैसे ही आप किसी कठिन अक्षर को देखते है वैसे ही आप भागने का प्रयास करते है और हकलाहट आप को और परेसान करना चालू कर देती है और आप की धड़कने बढ जाती है और आप बुरी तरह हकला जाते है
2- आप थोड़ी हिम्मत कीजिए और शु शु शु -------, या , शी शी शी------- या शिटी बजाते हुए पहले अपने आप को रोके अर्थात थोड़ी देर कुत्ते के सामने अपने आप को रोके , टेक्निक( शु शु शु -------, या , शी शी शी------- या शिटी) उसे करना पड़ेगा तब कुत्ता आपने आप धीमा पड़ जायेगा, और आप सहेज भाव से कुत्ते के बिरोध से निजात पा सकते है ,ठीक इसी प्रकार से हकलाना को भी आप टेक्निक का यूज़ कर के हकलाने के डर से निजात पा सकते है
जब भी आप को कठिन वर्ड दिखे आप भागने या बचने का प्रयास मत कीजिए बल्कि सामना करे तब आप कुछ ही दिनों में बेहतर अनुभव करेगे
Wednesday, May 11, 2011
हकलाने से आसानी से उबरा जा सकता है।
हकलाना या अटक-अटक कर बोलना स्वर-यंत्र की खामी न होकर मन की बेचैनी है। यह बात ज्यादातर लोग नहीं जानते। दरअसल, यह एक ऐसी समस्या है जिसकी शुरुआत आम तौर पर बचपन से तब होती है जब बच्चा बोलना सीखता है। यह मन की निराशा, जीभ के जोड़ में मामूली कमी या कई बार असाधारण तनाव से जुड़ी होती है। किसी घर में अगर हर समय कलह रहे, बच्चों को बोलना सीखने की उम्र में ही मार-डाँट पड़ने लगे, उसे तुतलाने और हकलाने पर पूरा ध्यान और जरूरी टोकाटाकी न हो तो परेशानी बन जाती है। इसके अलावा, स्कूल में पढ़ाई-लिखाई या किसी दूसरी चीज को लेकर बहुत अधिक तनाव रहे तो उसका असर अनजाने में ही हकलाहट की परेशानी खड़ी कर देती है। इसके अलावा, संगी-साथियों, भाई-बहन द्वारा चिढ़ाए जाने और बड़े-बूढ़ों के बार-बार इस ओर ध्यान दिलाने पर बच्चों की जिद से भी यह दोष स्थायी हो सकता है। सचाई यह भी है कि हकलाने वाला व्यक्ति अपने ख्यालों में जरा भी नहीं अटकता। अगर वह अकेले में खुद से बातें करे तो उसे कोई परेशानी नहीं होती। गाते समय भी उसकी जुबान में कोई अटक नहीं पैदा होती। उसके स्वर यंत्र और स्नायु तंत्र की जांच करें तो उनमें भी कोई कमी नहीं मिलती। यही वजह है कि हकलाने से आसानी से उबरा जा सकता है।
यदि कोई हकलाने या अटक-अटक कर बोलने वाला सदस्य घर में हो तो उसमें सही बोलने की ललक पैदा करें। उसे यह समझाया जो कि उसका स्वर यंत्र भी उतना ही समर्थ है जितना कि दूसरे लोगों का। इस पर भरोसा जागा तो ही वह सही बोलने का प्रयास करेगा।
यकीन जानिए, हकलाहट से मन ही मन परेशानी तो होती है, पर इसके चलते शर्मिदा होने की कतई जरूरत नहीं। ऐसे लोगों के लिए सलाह यही है कि वे लोगों से मिले-जुलें, और सुधार कर बातचीत करने का प्रयास करते रहें। अपने भीतर आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान जगाएं, तभी इस समस्या से छुटकारा मिल सकेगा। किसी स्पीच थैरेपिस्ट से मिलकर अपनी समस्या का खुलासा करें। थैरेपिस्ट आपकी समस्या के बुनियादी कारणों को समझ कर सही उच्चारण के उपाय सुझा सकते हैं।
सही बोलने में झिझके नहीं, वैसा ही अनुभव करें जैसा सामान्य उच्चरण क्षमता होने पर आप अनुभव करते। अपनी खामी पर शर्मिदा हुए बिना बोलने का अभ्यास करते रहें, क्योंकि यह आपकी इच्छाशक्ति पर ज्यादा निर्भर है।
तैयारी डेस्क
यदि कोई हकलाने या अटक-अटक कर बोलने वाला सदस्य घर में हो तो उसमें सही बोलने की ललक पैदा करें। उसे यह समझाया जो कि उसका स्वर यंत्र भी उतना ही समर्थ है जितना कि दूसरे लोगों का। इस पर भरोसा जागा तो ही वह सही बोलने का प्रयास करेगा।
यकीन जानिए, हकलाहट से मन ही मन परेशानी तो होती है, पर इसके चलते शर्मिदा होने की कतई जरूरत नहीं। ऐसे लोगों के लिए सलाह यही है कि वे लोगों से मिले-जुलें, और सुधार कर बातचीत करने का प्रयास करते रहें। अपने भीतर आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान जगाएं, तभी इस समस्या से छुटकारा मिल सकेगा। किसी स्पीच थैरेपिस्ट से मिलकर अपनी समस्या का खुलासा करें। थैरेपिस्ट आपकी समस्या के बुनियादी कारणों को समझ कर सही उच्चारण के उपाय सुझा सकते हैं।
सही बोलने में झिझके नहीं, वैसा ही अनुभव करें जैसा सामान्य उच्चरण क्षमता होने पर आप अनुभव करते। अपनी खामी पर शर्मिदा हुए बिना बोलने का अभ्यास करते रहें, क्योंकि यह आपकी इच्छाशक्ति पर ज्यादा निर्भर है।
तैयारी डेस्क
Monday, January 31, 2011
हकलाहट -----हिंदी फिल्मों
संवेदना का टोटा
एक अहम् सवाल यह है कि आखिर कब तक समाज और मीडिया द्वारा शारीरिक
और मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण व्यक्तिओं को बेबस और बेचारा समझा जाता रहेगा? क्या मानवीय संवेदनाओं कीपरिधि में आकर भी हम कभी सोचेंगे और निःशक्तजनों या फिर हकलाने वाले लोगों के प्रति जिम्मेदाराना रवैयाअपनाएंगे.
हिंदी फिल्मों के बारे में शायद सबसे प्रचलित वाक्य यह है कि ये समाज का आईना हैं. लेकिन क्या इस आईने में उन लोगों के लिए कोई जगह नहीं जो शारीरिक या मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण हैं? जब पूरी दुनिया एक-दूसरे के करीब आ रही है, तो आखिर कोई पीछे कैसे रह सकता है. हो सकता है कि इंसान पक्षपात करता हो पर कारोबार की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह सभी चीजों में मुनाफे का मौका तलाशता है. एक जमाना था जब यह मान के चला जाता था कि निःशक्त व्यक्ति अपने परिवार और समाज पर बोझ हैं. कमोबेश यही धारणा आज भी हमारे मन में बसी हुई है. इन सबके बावजूद हिंदी सिनेमा जगत में इन दिनों विकलांगता और विकलागों को सिल्वर स्क्रीन पर दिखाने कि बेताबी के निहितार्थ को आसानी से समझा जा सकता है.
नवम्बर 2010 में रिलीज हुई फ़िल्म 'गोलमाल 3' में एक पात्र से हकलाहट का जबरन अभिनय करवाकर हास्य पैदा करने कि कोशिश की गई है. इस फ़िल्म में एक और पात्र है जो बोल नहीं सकता लेकिन अच्छी तरह से सुन सकता है और इस पात्र का अभिनय पूरी तरह से गलत है, क्योकि जो व्यक्ति सुन सकता है वह बोल भी सकता है. आजकल लगभग हर फ़िल्म में ऐसे रोल रखे जाते हैं जो शारीरिक रूप से अक्षम हैं या फिर हकलाते या तुतलाते हैं. यदि हम पिछले समय को देखें तो 'ब्लैक', 'इकबाल', 'तारे जमीं पर' और 'पा' ऐसी बेहतरीन फिल्में हैं जिन्होंने निःशक्त लोगों के प्रति समाज में सकारात्मक सन्देश दिया है. और इन फिल्मों की सफलता ने बॉलीवुड को एक नया विषय दिया, जिसे अब हर फ़िल्म निर्माता आजमाना चाहता है.
यहाँ विकलांगता पर बनी फिल्मों के सकारात्मक पहलूओं पर चर्चा करना सामयिक होगा. विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन, मध्यप्रदेश में रिसर्च आफीसर डॉ. निवेदिता वर्मा कहती हैं निःशक्तता को पर्दे पर प्रदर्शित करने से इस चुनौती का सामना कर रहे लोगों और उनके परिवार को संबल मिलता है और वे कुछ हद तक मानसिक और सामाजिक दबाव से मुक्त हो जाते हैं. साथ ही समाज में इन विषयों पर जागरूकता आती है. डॉ. वर्मा आगे कहती हैं फिल्मों में हकलाहट को व्यंग्यात्मक रूप में न दिखाकर उसके समाधानात्मक पक्ष को ज्यादा महत्त्व दिया जाना चाहिए. वे कहती हैं हर व्यक्ति में कोई न कोई कमी है, इसलिए हमें इन्हें दूर करने के लिए एक-दूसरे का सहयोग और उत्साहवर्धन करना चाहिए.
पर एक अहम् सवाल यह है कि ये फिल्में शारीरिक तौर पर चुनौतीपूर्ण लोगों के प्रति कितनी संवेदनशील हैं. 'ब्लैक' जैसी संजीदा फ़िल्म ने हिंदी फ़िल्म उद्योग को चुनौतीपूर्ण चरित्रों को पर्दे पर उतारने कि प्रेरणा जरूर दी लेकिन उसके बात बनी ऐसी फिल्मों में निःशक्त पात्रों के प्रति आमतौर पर संवेदनशीलता का अभाव ही दिख रहा है. हमेशा कहानियों, चरित्रों और नयेपन की कमी से जूझने वाले बॉलीवुड ने शारीरिक अक्षमता जैसे गंभीर विषय को यहाँ मसाले में लपेट दिया. पुरानी फ़िल्म 'दोस्ती' में दो शारीरिक अक्षम दोस्त जिस तरह से एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़े देखे जा सकते हैं, वैसी भावना या सम्बन्ध ताजा फिल्मों में कहीं नहीं दिखते. निर्माता और निर्देशक व्यवसायिकता और अलग करने के चक्कर में कुछ भी कर सकते हैं.
विकलांगता पर बनी फिल्में समाज को जो नकारात्मक सन्देश दे रही है, वह चिंता का विषय है. क्षेत्रीय विकलांग पुनर्वास केंद्र, भोपाल के अनुदेशक श्यामसिंह मेवाडा कहते हैं ये फिल्में समाज में विकलांगों के प्रति गलत सोच को बढ़ावा दे रही है. इससे लोग विकलांगों को दया या हंसी का पात्र समझने लगते हैं, और विकलांगों की सामाजिक समस्या जस की तस बनी रहती है. इंदौर में बधिरों कि शिक्षा से जुड़े सुनीलसिंह तोमर कहते हैं जब फिल्मों में
निःशक्तजनों को बेबस के रूप में पेश किया किया जाता है तब लोग उन्हें कमजोर और नाकाबिल समझने पर मजबूर हो जाते है. और यह स्थिति विकलांगों के पुनर्वास में बाधा उत्पन्न करती है.
हम कह सकते हैं कि निःशक्तता पर बनी फिल्में समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में कारगर हो सकती हैं, लेकिन इसके लिए फ़िल्म निर्माताओं, लेखकों और अभिनेताओं को विकलांगता के प्रति अधिक जागरूक और संवेदनशील होना पड़ेगा. इसके बाद हम देखेंगे कि बॉलीवुड पर निःशक्तता और इसका सामना कर रहे व्यक्तिओं के जीवन पर बेहतर फिल्में बनाने का सिलसिला शुरू होगा. फिल्मों में यह दिखाया जाना ज्यादा श्रेयस्कर होगा कि विकलांग व्यक्ति किस तरह तमाम बाधाओं को पार करते हुए सामान्य जन के साथ कंधे से कन्धा मिलकर चल रहे हैं और अपनी शेष क्षमताओं का उपयोग कर राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं.
- अमितसिंह कुशवाह,
Saturday, January 29, 2011
हकलाहट कि जेल
"हकलाहट कि जेल ( HKJ ) दोस्तों आप को आज मै अपनी बीती सुनाता हू
hkj में मै अपनी लाईफ को घुट घुट क़र जीता था हकलाहट मुझे मनेज करती रहती और मै HKJ कि हकलाहट के हुक्कम सहता रहा इस जेल में भारत कि एक करोड़ आबादी बंद है यह एक अनोखी जेल है इसमें मार तो बहुत पड़ती है पर बताने कि हिम्मत नहीं होती, चिल्लाने का सहस नहीं होता,रोने से दिल नहीं भरता, हर तीन चार मिनिट में पिटाई होती है,पर अपनों से कहने का सहस नहीं होता ,HKJ में मेरा कुछ नहीं चलता मै हकलाहट के द्वारा मेनेज किया जाता मै बोलना चाहता
"एक गिलास पानी लाओ "
पर सिपाही आता और कहता मेरे अनुसार बोलो -------" पानी लाओ एक गिलास
दूसरा सिपाही आता बोलता मेरे अनुसार बोलो............................ "लाओ न एक गिलास पानी "
जब दोनों सिपाही एक साथ आते तो मै किसकी मानता ? इसलिया मै पानी कि जगह water बोलता और दोनों सिपाहियों से जान बचने के लिए" एक गिलास वाटर लाओ " बोलता |
जब जेलर साहब आते तब तो पानी, जल, वाटर , बोलना संभव नहीं था ,मुहु कि ओर इशारा करता और बोलता "एक गिलास .....lao ." कुछ कैदी जो समझदार थे वह तो समझ जाते कि पानी चाहिया , lekin जो saitani kism के कैदी थे ve bolte थे daru चाहिया kya | मै अत्याचारों को बताना चाहता था लोगो को,पापाजी को ,मम्मी जी को , दोस्तो को ,पर हिम्मत नहीं थी | आप को और भी दर्द सुनाता हू सायद आप भी मेरे जैसा दर्द झेले हो ---------------------------------------
hkj में मै एक बार ENT डाक्टर साहब के पास pahucha शायद मुझे अपनी फ़रिअद सुनानी थी लेकिन डाक्टर साहब कि केबिन बे pahucha और देखा ३-४ रोगी और बैठे है तभी मन में HKJ के सिपाही आ धमके, और बोले यदि tumne अपना दर्द बताया तो दुसरे रोगी क्या बोलेगे तुम्हारी तो इज्ज़त गई ,हशी का पत्र बनोगे मत कहो कि मै हकलाना के इलाज के liye आया हू | कह दो डॉक्टर साहब बुखार है | और HKJ के सिपाहियों कि बात माननी पड़ी और कहना चाहा " डॉक्टर साहब मुझे बुखार है " लेकिन दुसरे सिपाही ने फिर कहा कि आप बुखार को फीवर बोलो मै उसकी भी बात maanaa और तय किया कि अब " डॉक्टर साहब मुझे फीवर है" बोलना है लेकिन जेलर साहब भी साथ में थे उहोने कहा आप फीवर को ffffffffffeever बोलोगे ठीक है
मै बेचारा प्रार्थना किया कि जेलर साहब यदि मै "डॉक्टर साहब मेरा शारीर गर्म है" बोलु तो कैसा रहेगा जेलर साहब मंजूरी देदिए | अब मै ख़ुशी से पागल हो गया और स्पीड 500ward / मिनट के साथ बोला तो डॉक्टर साहब समझ नहीं पाए कि "मेरा शारीर गरम है " yah बोला, vah samjhe कि "डॉक्टर साहब मेरा शारीर gam में है " yah बोला, तो डॉक्टर साहब बोले ghar jao santi से rah,o ladiee मत किया karo, gam apne आप ठीक हो jaye ga, मै bina thanks के chember से bahar आ गया
और iswar को thnks कहा कि यदि डॉक्टर साहब sahi sun lete कि मेरा शारीर गरम है ,तो bina injection के नहीं chhodte
thanks स्पीड, jo aapne आप bad गई और मै injection से bach गया
thaks
B.K.Singh (Psychologist &stammerer)
www.stammeringlife.com
suraj stammering care centre Maihar MP
09200824528,09300273703,
hkj में मै अपनी लाईफ को घुट घुट क़र जीता था हकलाहट मुझे मनेज करती रहती और मै HKJ कि हकलाहट के हुक्कम सहता रहा इस जेल में भारत कि एक करोड़ आबादी बंद है यह एक अनोखी जेल है इसमें मार तो बहुत पड़ती है पर बताने कि हिम्मत नहीं होती, चिल्लाने का सहस नहीं होता,रोने से दिल नहीं भरता, हर तीन चार मिनिट में पिटाई होती है,पर अपनों से कहने का सहस नहीं होता ,HKJ में मेरा कुछ नहीं चलता मै हकलाहट के द्वारा मेनेज किया जाता मै बोलना चाहता
"एक गिलास पानी लाओ "
पर सिपाही आता और कहता मेरे अनुसार बोलो -------" पानी लाओ एक गिलास
दूसरा सिपाही आता बोलता मेरे अनुसार बोलो............................ "लाओ न एक गिलास पानी "
जब दोनों सिपाही एक साथ आते तो मै किसकी मानता ? इसलिया मै पानी कि जगह water बोलता और दोनों सिपाहियों से जान बचने के लिए" एक गिलास वाटर लाओ " बोलता |
जब जेलर साहब आते तब तो पानी, जल, वाटर , बोलना संभव नहीं था ,मुहु कि ओर इशारा करता और बोलता "एक गिलास .....lao ." कुछ कैदी जो समझदार थे वह तो समझ जाते कि पानी चाहिया , lekin जो saitani kism के कैदी थे ve bolte थे daru चाहिया kya | मै अत्याचारों को बताना चाहता था लोगो को,पापाजी को ,मम्मी जी को , दोस्तो को ,पर हिम्मत नहीं थी | आप को और भी दर्द सुनाता हू सायद आप भी मेरे जैसा दर्द झेले हो ---------------------------------------
hkj में मै एक बार ENT डाक्टर साहब के पास pahucha शायद मुझे अपनी फ़रिअद सुनानी थी लेकिन डाक्टर साहब कि केबिन बे pahucha और देखा ३-४ रोगी और बैठे है तभी मन में HKJ के सिपाही आ धमके, और बोले यदि tumne अपना दर्द बताया तो दुसरे रोगी क्या बोलेगे तुम्हारी तो इज्ज़त गई ,हशी का पत्र बनोगे मत कहो कि मै हकलाना के इलाज के liye आया हू | कह दो डॉक्टर साहब बुखार है | और HKJ के सिपाहियों कि बात माननी पड़ी और कहना चाहा " डॉक्टर साहब मुझे बुखार है " लेकिन दुसरे सिपाही ने फिर कहा कि आप बुखार को फीवर बोलो मै उसकी भी बात maanaa और तय किया कि अब " डॉक्टर साहब मुझे फीवर है" बोलना है लेकिन जेलर साहब भी साथ में थे उहोने कहा आप फीवर को ffffffffffeever बोलोगे ठीक है
मै बेचारा प्रार्थना किया कि जेलर साहब यदि मै "डॉक्टर साहब मेरा शारीर गर्म है" बोलु तो कैसा रहेगा जेलर साहब मंजूरी देदिए | अब मै ख़ुशी से पागल हो गया और स्पीड 500ward / मिनट के साथ बोला तो डॉक्टर साहब समझ नहीं पाए कि "मेरा शारीर गरम है " yah बोला, vah samjhe कि "डॉक्टर साहब मेरा शारीर gam में है " yah बोला, तो डॉक्टर साहब बोले ghar jao santi से rah,o ladiee मत किया karo, gam apne आप ठीक हो jaye ga, मै bina thanks के chember से bahar आ गया
और iswar को thnks कहा कि यदि डॉक्टर साहब sahi sun lete कि मेरा शारीर गरम है ,तो bina injection के नहीं chhodte
thanks स्पीड, jo aapne आप bad गई और मै injection से bach गया
thaks
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09200824528,09300273703,
Wednesday, October 27, 2010
हकलाने के रोग के खिलाफ क्लीनिकल कोशिश वाला विशेषज्ञ
हकलाने के रोग के खिलाफ क्लीनिकल कोशिश वाला विशेषज्ञ
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उत्तरी चीन के शिआन शहर में हकलाने के रोग के लिए विशेषज्ञ प्रोफेसर चेन च्या रूं अनेक वर्षों से हकलाने के रोग को दूर करने के उपायों का अनुसंधान कर रहे हैं और इस क्षेत्र में उन्होंने बड़ी प्रगति भी हासिल की है । इधर के वर्षों में उन्हों ने अपने तरीके से कोई बीस हजार रोगों को हकलाने के रोग और दुख से मुक्त किया है ।
श्री चेन ने शिआन शहर में स्थापित अपने 'बोलियों का आदान-प्रदान विशेष स्कूल 'में संवाददाताओं
स्कूल में देश के कोने-कोने से आये हुए छात्र हैं । सिंच्यांग स्वायत्त प्रदेश से आए लड़के वांग ह्वा ने कहा कि कल की क्लास में अध्यापक ने उसे मानसिक शिक्षा दी और उस के दिल में सक्रिय भावना पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया। लड़का वांग ह्वा पहले उदासी में फंसा हुआ था , स्कूल में शिक्षा लेने के बाद अब वह एक खुला और प्रसन्नचित्त लड़का बन गया है ।
उस ने संवाददाता को बताया , अब मैं एक तेल मजदूर हूं , बाद में मैं भी कारोबारों में निर्देशक जैसा लीडर बनना चाहूंगा । और यहां के अभ्यास से मेरे भविष्य की लिए नींव तैयार हो रही है।
शिआन शहर के'बोलियों का आदान-प्रदान विशेष स्कूल 'में पढ़ने वाले छात्रों के साथ बातचीत करते समय कोई मौखिक बाधा नहीं महसूस होती है । लेकिन इने-गिने दिनों से पहले उन की हालत गंभीर ही थी ।
श्री चेन के इलाज करने के तरीके की ऐसी विशेषता है कि छात्र
श्री चेन ने कहा कि उन के स्कूल में सब से पहले छात्रों को धीरे-धीरे बातचीत करना सिखाया जाता है । यानी नम्रता से बातचीत करनी चाहिये । इस के बाद छात्रों को मानसिक तौर पर तैयार किया जाता है । क्योंकि हकलाने वालों में आम तौर पर आत्मविश्वास की कमी रहती है । इसलिए हकलाहट को दूर करने के लिए सर्वप्रथम उन में आत्मविश्वास की कमी को दूर करना जरुरी है ,और चेन के स्कूल में छात्रों को मानसिक विश्लेषण, याद करने तथा मानसिक दबाव से मुक्त करने आदि के उपाय अपनाए जाते हैं । अवचेतन को बदलाने के जरिये हकलाने वालों के विचारों में परिवर्तन किया जा सकता है ।
श्री चेन ने कहा कि हकलाहट से ग्रस्त छात्र आम तौर पर तनावग्रस्त होने की स्थिति में, आसपास बहुत भीड़ होने पर, या विपरित लिंग के सामने हकलाने लगते हैं । इसलिए ऐसे
श्री चेन अक्सर अपने हकलाने वाले छात्रों को सड़क, बसों जैसी भीड़-भाड़ वाली जगहों में भाषण देने का अभ्यास करवाते हैं , ताकि उन के मानसिक धैर्य को उन्नत किया जा सके । इस उपाय से छात्रों को बड़ा लाभ मिलता है । छात्रों में से एक , मिस वांग यू ली ने कहा , मैं पहले हकलाने के कारण बहुत कम बातचीत कर पाती थी । क्योंकि मैं दूसरों के सामने आसानी से नहीं बोल सकती थी । अगर दूसरों ने मेरी हकलाहट की चर्चा की या मेरे सामने इस बात को उठाया , तो मुझे बहुत दुख होता था। यहां अभ्यास करके मैं बेरोकटोक बातचीत कर सकती हूं , यह मेरी जिंदगी भर की अभिलाषा है ।
लेकिन लोग यह नहीं जानते हैं कि'बोलियों का आदान-प्रदान विशेष स्कूल 'के संस्थापक श्री चेन च्या रूं खुद भी एक हकलाने वाले व्यक्ति थे । अपने बचपन से ही श्री चेन हकलाहट से ग्रस्त रहे थे । उन्हों ने कहा, दूसरे लोगों के सामने जब भी मैं मुंह खोलता , मेरा दिल धक-धक दौड़ने लगता ,मेरी सांस फूल जाती और शरीर पसीने से लथपथ हो जाता। मीडिल स्कूल में अपना कोर्स समाप्त क
उन्हों ने कहा कि हकलाहट का खात्मा करने के लिए मैं ने जानबूझकर पहाड़, पेड़, नदी और पशुओं के सामने जा कर बोलने का अभ्यास किया । कभी-कभी मैं ने मुंह में एक छोटा पत्थर रखकर बातचीत करता था , ताकि मुंह की शक्ति को मजबूत किया जा सके । अनगिनत बार अभ्यास करने के बाद चेन च्या रूं ने महसूस किया कि दिल में अशांत होना , या मानसिक तौर पर तनावग्रस्त रहना हकलाहट का प्रमुख कारण है । इसलिए हकलाहट को दूर करने के लिए सर्वप्रथम दिल में मौजूद अस्वाभाविकता को दूर किया जाना चाहिए । श्री चेन ने हकलाहट के इलाज में लम्बी सांस लेने , विशेष मांस पेशियों का अभ्यास, उच्चारण अभ्यास आदि तरीकों का अनुसंधान किया ।
श्री चेन ने अपने उपायों की चर्चा में कहा कि जब हम मानसिक तनाव को दूर कर लेते हैं , तब हमें ए
अपनी हकलाहट को दूर करने के बाद श्री चेन ने दूसरे हकलाने वालों की मदद करनी चाही। अपने उपायों के जरिये एक विशेष स्कूल खोलकर अधिकाधिक हकलों के दुख दूर करने का विचार उन के मन में आया ।
इधर के वर्षों में श्री चेन ने इलाज के अपने तरीकों से तथा स्कूल के जरिये बहुत से हकलाने वालों की मदद की है और देश के विभिन्न तबकों से अनगिनत सम्मान और प्रशंसा हासिल की है । देश के राजकीय संपदाधिकार ब्यूरो ने उन के हकलाहट इलाज तरीकों के आविष्कार को पैटेंट के लिए सौंपा है , स्थानीय सरकार ने उन्हें सम्मानित किया है, अनेक कालेज़ों ने उन्हें अपने यहां व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया है , देश के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में श्री चेन हकलाहट के इलाज में बहुत उच्च कौशल प्राप्त चिकित्सक के नाम से जाने जाते हैं ।
अब श्री चेन के स्कूल में केवल हकलाहट का इलाज नहीं किया जा रहा है , जवानों के भाषण कौशल का अभ्यास करने का कोर्स भी चलाया जा रहा है । श्री चेन अपने कौशल से अधिकाधिक लोगों को शानदार जीवन उपलब्ध कराना चाहते हैं ।
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